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सागर सुत, सुर कर सजे, रमा, शशी को भ्रात |

उच्च कुल उच्च संग रह, फिर क्यूँ शंख कहात ||

फूँक पराई ये बजे , उर ना बात समात |

पोल खोळ में पालकर, जग में शंख कहात ||

बीन, शहनाई, बासुरी, बजे फूँक बहु वाद्य |

पोल सभी उर पालते , हाय शंख दुर्भाग्य ||

पोल, फूँक सम है मगर, ये सुर सभी सजात |

स्वर एक बजता सदा , तब ही शंख कहात ||

युद्ध घोष, सुर आरती , और शवों के साथ |

हर अवसर हाजिर खड़ा, फिर भी शंख कहात ||

अवसर के अनुरूप ये , भाव नहीं प्रगटात |

इस कारण ही जगत में, सदा शंख कहलात ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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