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सच का कठोर धरातल चुनकर, ना टूटे उन वादों पर |

घर अपना तामीर करें प्रिये, प्यार भरी बुनियादों पर ||

सपनों के महल, घरोंदे बालू, कहाँ देर तक टिकते हैं |

क्यूँ जाया हम वक़्त करें, क्यूँ सींचें जल अवसादों पर ||

चूना, पत्थर, ख्वाब सुनहरे, हैं बना भला घर कब पाए |

ये तो आधार भरोसे बनें सदा, आपस की इमदादों पर ||

सुनसान बहुत से देखें हैं, हमने जग में आलिशानों को |

बस कर भी ना बसे कभी वो, जो थे नीम इरादों पर ||

धन दौलत, शान औ’ शौकत, बिन भी जो गुलजार रहे |

घर को बनाया घर कैसे, आ यह गौर करें आबादों पर ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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