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जगांश पर भिन्न जगत से, अनुपम अमित वरदायक माते |

इस रज पावन करने केलि, उत्कट अभिलाषा ले सुर आते ||

भाल किरीट नगराज सुशोभित, सुरसरी अमोलक हार गले |

सौभाग्य मनाता सागर पदतल, समग्रांश प्रकृति यहाँ मिलें ||         

बुनियाद सभ्यता प्रथम तुम्ही, हो जगद्गुरु जगनायक तुम |

सब पे लुटाती समभाव सदा, विपुल प्यार, सुखदायक तुम ||

दिनकर सी दीप्ति जिनकी है, ऐसे महा प्राण अनगिन जाये |

गिन कौन भला है सकता उनको, हित तेरे जो शीश कटाये ||

पर आज फिज़ा सारी बदली, डोले कदम कदम हैं व्यभिचारी |

सुत तेरे स्वार्थ पूत बने हैं, और सत्ता धारक निज सुखकारी ||

आज अराजकता पग पग है, घर में ना सुरक्षित लाज रही |

बेईमान, भ्रष्ट, चोर, लुटेरों की, माँ बज तूती है आज रही ||

माँ माफ़ करो दुर्भाव नहीं, पर यह कहना विवश हो पड़ता है |

वह पावन रज तेरी हुई अपावन, अब छूने से डर लगता है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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