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अंश प्रकृति हम दोनों, तुम मानव, मैं बदली हूँ |

तुम करते हो नादानी, थोड़ी सी मैं भी पगली हूँ ||

मन अपने की तुम करते, अंगारों से झोली भरते,

स्वार्थ हित बनकर अंधे, पथ बर्बादी पग धरते |

देख तुम्हारी ये मनमानी, मैं भी थोडा मचली हूँ |

अंश प्रकृति हम दोनों, तुम मानव, मैं बदली हूँ ||

रोक दिए जल पथ तुमने, नाश अरण्य कर डाला,

छीनी हरितमा वसुधा की, अम्बर रंग किया काला |

जीवन ढंग तुमने बदला, देख तुम्हे मैं बदली हूँ |

अंश प्रकृति हम दोनों, तुम मानव, मैं बदली हूँ ||

दोष लगाते फिरते मुझ पर, सूखे और सैलाबों का,

पहले बैठ हिसाब करो तुम, अपने किये गुनाहों का |

सजा विधान सभी के हेतु, देने तुमको निकली हूँ |

अंश प्रकृति हम दोनों, तुम मानव, मैं बदली हूँ ||

गर तुम मर्जी के मालिक, दासी मैं भी क्रीत नहीं,

जैसा बोओ वैसा पाओ, इस जग की है रीत यही |

ना मैं हूँ अरि जगत  की, ना ही तो मैं पगली हूँ |

अंश प्रकृति हम दोनों, तुम मानव, मैं बदली हूँ ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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