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ganga

हिम श्रृंग से विमल धवल, अजस्र सलिल ले धार चली |

मुक्ता हार सी मातृ वक्ष पर, करती अनंत उपकार चली ||

तजा साथ हरी, अज, सुर का, छोड़ स्वर्ग भी आई तुम |

कल्याण सकल का भाव लिए, नीर सुधा संग लाई तुम ||

जीवन दाता मोक्ष प्रदाता, जीवन कितने तुमसे धन्य हुए |

पावन तेरा पा सान्निद्य, अधमी के अकर्म भी पुण्य हुए ||

तट, रज, नीर सभी पावन, और तारक तेरा नाम महज |

दृढ आस्था जन की तुम, किया सदा ही कल्याण सहज ||

ममत्व लुटाया तुमने हर पल, पर बदले में क्या पाया है |

कर कुत्सित कृत्य कपूतों ने, समग्र तुझे तो गंदलाया है ||

माँ माफ़ करो दुर्भाव नहीं, पर कहना विवश हो पड़ता है |

वह नीर अमिय अब हुआ हलाहल, पीने से डर लगता है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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