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बैठी

बैठी को भान हुआ है मनो, घर ओर किये हैं पिव गवना |

उचाट लगी चित चैन नहीं, सूझि न परे कछु क्या करना ||

विचार कियो चल देख ही लूँ, शायद सच हो मन सपना |

घट ले झट पनघट जा बैठी, अरु देखत राह रही ललना ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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