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8th

अवसर पाकर तुम अक्सर, तन्हाई में आ जाती हो |

छू कर यादों के तारों को, विस्मृत साज बजाती हो ||

ले जाती उन लम्हों में, जहाँ सजे सपन सतरंगी थे |

कैसी हो अनबूझ पहेली, तुम आकर भी ना आती हो ||

नहीं सताना गया तेरा, कहने की अदा वो मुस्काकर |

पहले सताती कह जाना है, अब यादों से ना जाकर ||

कैसे भूलाऊँ मैं तुझको, बस इतना मुझको बतला दे |

मैं लाख जतन कर हारा हूँ, जाती ना यादों में आकर ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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