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Waiting_for_Rain

झुलस रहे हम जीव सभी, घिर आ श्याम घटा प्यारी |

दहक रहा है अंचल सारा, तूँ नेह का मेह लुटा प्यारी ||

सूखे ताल, सरित, पोखर हैं, विदीर्ण धरा की छाती है |

गिरी, कानन, तरू झुलसे हैं, किरणें आग बरसाती है ||

और हवा भी बनकर बैरन, चलती है चाम जलाने को |

तीनों चर के जीव त्रस्त हैं, फिरते हैं प्राण बचाने को ||

जीवन दाता तेरे जीव विकल, बरस, संताप हटा प्यारी |

झुलस रहे हम जीव सभी, घिर आ श्याम घटा प्यारी ||

वृक्ष विहीन, भवन वन शहर, बना कोलतार दावानल है |

प्यासे कंठ, भटके आतप में, दो बूँद ना शीतल जल है ||

पानी की जन में मारामारी, ना कोई हमारी सुधि लेता |

जिसका खुद का बर्तन खाली, कहाँ किसे वो कुछ देता ||

हम श्वान, पखेरू, गैया व्याकुल, तूँ ही पीर मिटा प्यारी ||

झुलस रहे हम जीव सभी, घिर आ श्याम घटा प्यारी ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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