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शाम जल्दी ढल जरा,अब अश्क हुए बेताब हैं
खार की ना बात कर, यहाँ चुभ रहे गुलाब हैं

मौत भी मुझे देख कर, यह मुस्कुरा के कह गई
मर मर के जीना है तुझे, अपना यह हिसाब है

कसमें वादे चाहत की , इबारत जिसमें शाया थी
आतिशे जहाँ में खाक , वफ़ा की वो किताब है

मौसम वही है रात वही , बस आलम बदल गया
दहक रही है चाँदनी, ये सुलग रहा माहताब है

अब ना कोई आरज़ू, बाकि है दिल ए बर्बाद में
तन्हाई में हमजुबाँ कुछ बिखरे बिखरे ख्वाब है

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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