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ना होगा कुछ भी इक बदले, आओ मिल हम-तुम बदलें |

ये ढंग बदलें, ये जग बदलें, आओ मिल हम-तुम बदलें ||

लुटती अस्मत सरेराह, है पीर तुम्हे भी, और हमको भी |

कुछ भूलें हम स्वीकार करें, कुछ करनी होगी तुमको भी ||

तुम भी जीवन का ढंग बदलो, हम भी जीवन ढंग बदलें |

ना होगा कुछ भी इक बदले, आओ मिल हम-तुम बदलें ||

है मेरे घर का चूल्हा सूना, और घर तेरे जूठन का ढेर बड़ा |

प्रथम पृष्ठ संविधान लिखा, फिर क्यूँ इतना अंधेर बड़ा ||

मैं श्रम दूँ, तुम दो हक़ पूरा, हम बीच पड़ी यह खाई बदलें |

ना होगा कुछ भी इक बदले, आओ मिल हम-तुम बदलें ||

तुम ब्राह्मण, मैं हरिजन हूँ, पर तुम क्या चार भुजाधारी |

एक सभी है अवयव अपने, और देखो एक है देह हमारी ||

इक संस्कार सभी अपने, फिर क्यूँ ना जाति सोचें बदलें |

ना होगा कुछ भी इक बदले, आओ मिल हम-तुम बदलें ||

मेरे खून का रंग लाल है, और ले देख तेरे का है रंग यही |

भाव बंदगी मालिक इक जैसा, बस एक इबादत ढंग नहीं ||

मैं अज़ान, तूँ आरती सुनले, इन धर्माधीशों के धंधे बदलें |

ना होगा कुछ भी इक बदले, आओ मिल हम-तुम बदलें ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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