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सुबह हुई लो दोनों चले, इक श्रम करने इक पढने को |

इक जीवन के यापन को, इक जीवन सपने बुनने को ||

इक के कंधे है बस्ता झूले, इक कंधे पर बोरा लटकाए |

इक के खुशियाँ पांवों में, इक बोझिल है कदम बढाए ||

इक जीवन पथ पर बढ़ने को, इक है कचरा चुनने को |

सुबह हुई लो दोनों चले, इक श्रम करने इक पढने को ||

इक के हाथ में होगी पुस्तक, इक में जूंठे बरतन होंगे |

इक सपने को पंख लगेंगे, इक के ढ़ाबों में दफन होंगे ||

इक ज्ञान का करेगा अर्जन, इक घुट घुट के मरने को |

सुबह हुई लो दोनों चले, इक श्रम करने इक पढने को ||

अपने वतन पर नाज़ हमें, पर अकर्मण्य सत्ता खलती है |

बनती तो निर्धन मत से, पर ये धनिक इशारे चलती है ||

कानून बना ले मौन साध, ये छल जनता से करने को |

सुबह हुई लो दोनों चले, इक श्रम करने इक पढने को ||

जिस रोज सभी शाला जायेंगे, उस सूरज को नमन होगा |

सच माने में उस दिन ही, मुस्काता अपना वतन होगा ||

आओ मिल के कदम बढायें, साथ साथ हम चलने को |

सुबह हुई लो सब साथ चले, संग सभी मिल पढने को ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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