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फासले दरमियाने इंसा, इस तरह़ा लो हुए |

हमकदम हमराह की, रही ना वो ज़ुस्त्ज़ुए ||

खुद्गर्जे माहौल है, दोष किस को दे भला |

अपनों में शुमार थे, पल में पराये वो हुए ||

होड़ ए तलुवे चाटने, है इस कदर मची हुई |

जीभ मेरी सबसे पहले, पैरे हाकिम को छुए ||

दरकार ना है अब कोई, पासों औ’ फरेब की |

हैं चीर द्रोपदी खींचने, रहे रास्तों पे हो जुए ||

पानी तो अब रीत रहा, नज़र औ” जमीन से |

सर सब्ज होंगे किस तरहा, फूटते वो अंखुए ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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