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pen_breaking_the_sword_by_facundo_pereyra-d565oow

मत छंदों के चुन बंधन को, बस भावों के संग बहता चल |

शब्दों को आवाज़ दिए जा, और अपने उर की कहता चल ||

चंद लोगों की मिथ्या वाह से, हासिल ना कुछ होने वाला |

नज़र जो आये अनर्थ तुझे, कलम उठा और लिखता चल ||

शिशु अंक है, तपती दोपहरी, मजदूरिन के भार को लिख |

बेबस है बहू बेटों के आगे, जो वृद्धा माँ लाचार को लिख ||

पल पल मरती मानवता है, यह पीर ह्रदय में सहता चल |

नज़र जो आये अनर्थ तुझे, कलम उठा और लिखता चल ||

अबला बाल दीन दलित पर, होते उन अत्याचार को लिख |

कदम कदम पर जो मिलता है, तूँ उस भ्रष्टाचार को लिख ||

बन कर इक अंगार विप्लव का, हरदम ही तूँ जलता चल |

नज़र जो आये अनर्थ तुझे, कलम उठा और लिखता चल ||

लिख मजदूरों के शोषण को, कृषक के झुकते कंधे लिख |

मासूम जनों को छलने खातिर, होते जो गोरख धंधे लिख ||

कर्म अनैतिक करने वाले, उन ह्रदय शूल सा खलता चल |

नज़र जो आये अनर्थ तुझे, कलम उठा और लिखता चल ||

यह देश तेरा ये जन तेरे, तूँ इनकी हर चीत्कार को लिख |

जब ये जननी आह्वान करे, उसकी हरेक पुकार को लिख ||

पड़ी उपेक्षित आज प्रकृति, इस दुखियारी से मिलता चल |

नज़र जो आये अनर्थ तुझे, कलम उठा और लिखता चल ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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