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चुभने लगी है आँख में, अब शक्लें फूल की |

मासूम समझ बैठे हम, बस इतनी भूल की ||

कहते थे जो कभी, तुम बस कहते ही रहो |

लगती है उनको अब मेरी, बातें फ़िज़ूल की ||

नज़रों को बचायेंगे भला, कब तक फरेब से |

फिर रहा हर शख्स है, लिए मुट्ठी धूल की ||

यहाँ पूछियेगा जिससे भी, है कहता ईमान से |

मय्यते हैं हर ठौर पे, यकीन औ” उसूल की ||

नोच रहें शाख वही, जो पत्ते उस पर हैं लगे |

पनप रही है हर तरफ, अब नस्लें बबूल की ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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