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mashal_00_06

आँखें हों लक्ष्य पर लगी, हों रास्ते दुर्गम घने |

ना मुड के देख नक्शे कदम, बने की ना बने ||

कारवाँ की सोच मत, तूँ अकेला ही चल निकल |

बनके स्वर्ण कल मिलेंगे, जो आज हैं लौह चने ||

राह की दुश्वारियों से तूँ, तनिक भी डरना नहीं |

हो हताश, उर अवसाद ले, पाँव पीछे धरना नहीं ||

नहीं विघ्न से वीर तो, होते कदाचित भयभीत हैं |

मरना तो है निज आन पे, भीरु बन मरना नहीं ||

देख ले ये कंठ सब, तो हैं गीत उसी के गा रहे |

बलिदान हुए जो लोक हित, या अब होने जा रहे ||

पाने को सुयश जगत में, बस पुरुषार्थ एक राह है |

लेना पकड़, हो सजग, जो अवसर तुझ पे आ रहे ||

चले चल, चले चल, देख ये साँस भी तो चल रही |

तम निशा आगोश में, है इक नवल भोर पल रही ||

पलट मत, पलट मत, अब तूँ पाँव पीछे खींच मत |

हर्गिज ना बुझने दे उसे, जो लौ लगन की जल रही ||

लौ लगन की जल रही, जो लौ लगन की जल रही ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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