Tags

, , , , , ,

sadWorld-web1

धुँआ धुँआ माहौल यहाँ, दम घुटता है, दम घुटता है |

घर के भीतर आज मनुज, अपनों के हाथों लुटता है ||

लगता है तुम बचे हुए हो ? पीठ पर खंजर ना खाए |

छोडो प्रेम, प्रीत की बातें, इन लफ़्ज़ों से डर लगता है ||

यह कैसा है चलन यहाँ, क्या ये ही अपनापन होता है |

जोर लगा पग सभी खींचते, जब ऊपर कोई उठता है ||

खोल जरा तुम देखो आँखे, सच में होता ऐसा पावोगे |

देते न सहारा, पर हंसते हैं, खा ठोकर कोई गिरता है ||

अय्याशों के मुख के ऊपर, सजती आदर्शों की बातें हैं |

और मनुज निज देख स्वार्थ, बन अनुयायी चलता है ||

सच के मुख पे सौ सौ ताले, यहाँ झूँठों की पौ बारह है |

शहीद स्मारक सूने सूने, और दर नेता मेला लगता है ||

मेहनत का फल मीठा होता, किसने कहा,क्या सोच कहा |

मध्यस्थ मजे से सब लूटे, नंगा कृषक धूप में तपता है ||

उर उमंग ना रही हंसी अब, मजबूरों पर नर हँसता है |

धुँआ धुँआ माहौल यहाँ, दम घुटता है, दम घुटता है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

Advertisements