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बनाया दिल को आईना, दिखे चहरे महोब्बतों के ||

उभरे ना उसमें अक्स तो, पल भी फितरतों के ||     

छाहें नसीबा अब नही, लो ये भी बदल गए |

गिरने लगे हैं देख लो, अब पत्ते दरख्तों  के ||

आये थे बनके कभी, दिले दौलत के पासबां |

ठग कर हमसे ले गए, वो लम्हे फुरसतों के ||

मय्यत में तो गैर भी, आते अदावत छोड़ के |

तन्हा मगर उठते हैं क्यों, जनाज़े हसरतों के ||

रहा ना यकीने यार अब, इस दौरे अय्याम में |

माने बदल गए हैं “देवल”, सच में उल्फतों के ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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