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Silhouette of hiking man jumping over the mountains

जाना है जग से सोच यही, क्यूँ नैराश्य भरें मन में |

करने को पड़े हैं काम बहुत, हमको अपने जीवन में ||

सुमन सूख गए खिलकर के, लगकर के हैं पात गिरे |

फिर भी बहारों का डेरा, लगता ही रहता उपवन में ||

अबाध गति ये काल चले, क्षण भर भी ना रुकता है |

पास नहीं ले जान जरा, खोने को पल भी उलझन में ||

कर्म धर्म है साँसों का, इस मानव जीवन का मर्म यही |

पुरुषार्थ के बीज छुपे हैं, महज अकेले इस नर तन में |

अवसाद पतन का कारण है, जय मिलती है उत्साहों से |

बीज उमंग के हरदम बोना, मन के इस सूने आँगन में ||

जायेंगे तभी तो फिर आयेंगे, है श्वास तंत्री का नाद यही |

सृष्टि सृजन का राज छुपा है, इसी लय, इस गुंजन में ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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