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H1

सपनों से सुंदर, फूल से नाज़ुक ,निर्झर की मधुर फुहार हो तुम |

जो वीरानों को कर दे गुलशन, प्रियवर वो बसंत बहार हो तुम ||

निश्छल नेह नदी सी बहती, बचपन अब भी तुझमें बसता है |

रूठ गई ले बात जरा सी, पर अब मुझे मना लो, जी करता है ||

ना आते कोई प्रपंच जगत के, केवल और केवल प्यार हो तुम |

जो वीरानों को कर दे गुलशन, प्रियवर वो बसंत बहार हो तुम ||

देवालय की हर प्रतिमा से है, बढ़कर हरदम ये पावन उर तेरा |

ना कोई कोयल मोर, पपीहा बोली, इन सबसे मधुर है सुर तेरा ||

ना तनिक जरूरत सजने की तुमको, खुद सोलह श्रंगार हो तुम |

जो वीरानों को कर दे गुलशन, प्रियवर वो बसंत बहार हो तुम ||

मधुमास सदा उर आँगन रहता, घनश्याम घटा इन कुन्तल में |

मुख चन्द पे छवियाँ पूनम की, और चपला इन नैना चंचल में ||

क्या हो तुम बस जान लो इतना, मेरा तो हर उद्गार हो तुम |

जो वीरानों को कर दे गुलशन, प्रियवर वो बसंत बहार हो तुम ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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