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अनघड तो हो धरा दफ़न, मैं बुनियाद बन जाता हूँ |

अगर तराशा शिल्पी ने, तो शोभा भवन बढाता हूँ ||

मैं दीवारों में चुनकर भी, सब भाँती सुरक्षा देता हूँ |

औरों के सुख की खातिर, हर दुःख हँस सह लेता हूँ ||

देकर अपनी कुर्बानी भी, नर की नज़र में कमतर हूँ |

रहा उपेक्षित हरदम ही, क्योंकि मैं तो एक पत्थर हूँ ||

मैं धरकर गिरि की काया, सीने से सरित बहाता हूँ |

अपने उर का प्यार जीव हित, दोनों हाथ लुटाता हूँ ||

मेघों का रस्ता रोक धरा को, चूनर हरित उढाता हूँ |

बहु संपदा देकर जग को, मैं तो सदा मुस्काता हूँ ||

प्रतिफल जो मुझे मिला है, सीने पे सहता नश्तर हूँ |

मैं हतभागा रहा हमेशा, क्योंकि मैं तो एक पत्थर हूँ ||

बना प्रतिमा देवालय में, मुझे यहाँ भी नर ने लूटा है |

श्रद्धा नहीं, ले चाहत आते, भाव ह्रदय का झूँठा है ||

घन प्रहार से नहीं दिल  मेरा, नर व्यवहार से टूटा है |

चुप रह सहने से ही शायद, भाग्य तो मुझसे रूठा है ||

ना पीर कभी मैं करता प्रकट, रखता उर के भीतर हूँ |

कर उपयोग भुला देते हैं, क्योंकि मैं तो एक पत्थर हूँ ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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