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नहीं रुका ये रोके किसी के, है जो पल ये बीत रहा |

देखो नयनों के आगे ही, ये घट जीवन का रीत रहा ||

अवसर जीवन के हों कोई भी, नहीं कभी ये रूकता है ||

ये है संगदिल पीर किसी की, सुनकर भी ना सुनता  है |

लाख करो प्रयास मगर पर, ये नहीं तनिक भी मुड़ता है |

यह तो अनवी रहा सदा ही, बिल्कुल भी ना झुकता है ||

जान मनुज ले यही यथार्थ, व्यर्थ क्यूँ कर व्यतीत रहा |

देखो नयनों के आगे ही, ये घट जीवन का रीत रहा ||

नहीं सहेजकर रख सकते, पर पा तो इसको सकते हैं |

लेते ज्ञानी पकड़ समय पर, अज्ञानी अवसर तकते हैं ||

प्रमादी तो मिथ्या तर्कों से, बस हरदम रहते झकते हैं |

जिन पैरों में पंख लगे हों, वे कहो कहाँ कब रूकते हैं ||

साहसी मंज़िल पा जाते हैं, भीरु तो सदा भयभीत रहा |

देखो नयनों के आगे ही, ये घट जीवन का रीत रहा ||

पल पल को पी ले प्राणी, पल ना ये फिर मिलने वाले |

तूँ जिस शाखा ठौर उसी पर, सुमन नये हैं खिलने वाले ||

रिश्ता जगत में है इतना, सब मिलने और बिछड़ने वाले |

जो मान जड़े गहरी बैठे हैं, वे पल भर में हैं ढ़हने वाले ||

इस काल का आज शाश्वत, न कोई भविष्य अतीत रहा |

देखो नयनों के आगे ही , ये घट जीवन का रीत रहा ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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