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16 A. Maharana Pratap

कर ना कदे फैलावणु, भीख सदा ही हेय |

हिम्मत सूं लेणू पडै, मांग्या हक़ कुण देय ||1||

भामासा आँख्यां सजळ, मांगे वंशज भीख |

रोव राण प्रतापसी, आ ही दिइ के सीख ||2||

सबदां रा बरछा लियां, कविता तेज़ कटार |

मंच चढ्या ये कवि करे, घणी घणी ललकार ||3||

कहणू तो सहजा घणू, करणू घणू दुश्वार |

मायड भाषा कारनै, कुण मरबा ने त्यार ||4||

चेताणू जद ही भलो, खुद में होवे जोर |

बाकी तो बरसात में, दादुर केरा शोर  ||5||

एक एक ग्यारह हुवे, आपां दिया पच्चीस |

एके सुर ये बोल ले, दिल्ली नवावे शीश ||6||

ईं धरणा, ईं मांग री, कठे पड़ी दरकार |

जो ये दो सौ बोल दे, खो देस्या सरकार ||7||

वे पच्चीस ये दोय सौ, मिलकर होवे लार |

दे राजस्थानी हक ने ,सामीं आ सरकार ||8||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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