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पुष्पित पथ क्यूँ चलता नर, चलना तो चल अंगारों पर |

संग प्रवाह सभी बह लेते, खे किश्ती उलटी धारों पर ||

चमन चाहना सब रखते हैं, तूँ सुरभित कर वीरानों को |

शुष्क मरू उर सुमन खिला, रख फिर हक़ बहारों पर ||

देह धारी हर जीव धरा पर, निज हित साधा करते हैं |

आहुति हित और प्राण की, प्रण रख उन विचारों पर ||

पुष्पित, पल्लवित तरु आकर्षण, पहले ले पहचान जरा |

विवेक कहाँ चढ़ना उन पर, जो खड़े सरित कगारों पर ||

लक्ष्यार्जन हित लघु पथ को, तो कर्मठ नर ना चुनते हैं |

किंचित मद ना जीत मिले, ना ही हो हताशा हारों पर ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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