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जब साँसे मिली है चंद हमें, फ़िर क्यों ना अपने ढंग जियें |

क्यों घुट के रहें इन बंधन में, क्यों हँसकर गम के घूँट पियें ||

और रहें सब शाद मगर, पर अपना भी तो हक़े – बहाराँ हो |

क्यों चाक करें दिल अपना, क्यों अपने ही हाथों फिर से सियें ||

माना के ना टूटे दिल कोई, पर क्या ये दिल, दिल है ही नहीं |

औरों पे नहीं है ठीक मगर, पर खुद पे सितम क्यूँ जाए कियें ||

ये दुनियाँ है, दुनियाँ वाले, हम कुछ ना करें, हैं फिर भी कहते |

परवाहे ज़माना क्यूँ करना, क्यों ज़ख्मों को दिल पर जाए लियें ||

ये तारे, बहारें, नदियाँ, गुलशन, इन लुत्फे-नजारों को क्यों खोना |

बेशक ना मगर हम कल होंगे, पर आज तो हम जी भर के जियें ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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