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मतवाला हूँ, पी हाला नहीं, मैं पीर पराई पीता हूँ |

साँसों का क़र्ज़ चुकाने को, हित समग्र के जीता हूँ ||

रखते ना सुमन हैं जगवाले, कर कंटक हैं लाख भरे,

क्षत तन, मन होता है, ये जहाँ कहीं भी हाथ धरे |

जगाचरण से विदीर्ण ह्रदय को, क्षण प्रति ही सींता हूँ |

———————————- मैं पीर पराई पीता हूँ ||

वो गरल नहीं है पास अहि, जो ये जिह्वा अपनी धरे |

उससे तो मरे इक बार मनुज, इससे सौ सौ बार मरे ||

मैं दग्ध मरू इस भूमि में, बहती लघु प्रेम सरिता हूँ |

———————————- मैं पीर पराई पीता हूँ ||

उपकार नहीं, कर्तव्य मगर है, मनुज कलेवर पाया है |

नर ना, नराधम है वो, दिल जिसने कोई दुखाया है ||

छंद ना लय हो कोई मगर, मैं मानवता की कविता हूँ |

———————————- मैं पीर पराई पीता हूँ ||

कोई कहे कुछ मुझको मगर, परवाह नहीं मैं करता हूँ ,

जितना भी होता है मुझसे, मैं ज़ख्म दिलों के भरता हूँ |

मैं मर्यादा गायक रामायण का, और उपदेशक गीता हूँ |

———————————- मैं पीर पराई पीता हूँ ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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