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doori

हम तुम जिसको लांघ सके ना, छोटी सी एक लकीर ही थी |

हँस के सहा, या चुप रहकर, वो और ना कोई, पीर ही थी ||

तुम धरा रही, मैं गगन रहा, मिलन क्षितिज सा रहा सदा,

चाह रही अतिशय उर दोनों, पूरी ना हुई, तकदीर ही थी |

हँस के सहा, या चुप रहकर, वो और ना कोई, पीर ही थी ||

जीवन सरिता के धारे संग संग, हम चलते रहे तटबंधों से,

तुम उधर रही, मैं रहा इधर, मिल ना सके, तकदीर ही थी |

हँस के सहा, या चुप रहकर, वो और ना कोई, पीर ही थी ||

मैं प्रभात प्राची के आँगन, तुम बन संध्या, पश्चिम में रही,

इक डोर बंधे, इक ठौर नहीं, ना पास कभी, तकदीर ही थी |

हँस के सहा, या चुप रहकर, वो और ना कोई, पीर ही थी ||

दोनों ही सदा हम दिल में रहे, मैं तेरे, तूँ मेरे दिल में रही |

दूर रहे फिर भी हम तुम, मिल के ना मिले तकदीर ही थी |

हँस के सहा, या चुप रहकर, वो और ना कोई, पीर ही थी ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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