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लाकर अश्क़ इन आँखों में, रुसवा-ए-महोब्बत क्यों करना |

प्यार किया कोई सौदा नहीं, पाने की हसरत क्यों करना ||

दिल में बसाया दिलबर को, और दिल तो मंदिर होता है |

जिसको सिजदा करते हैं, तो उसकी ज़िल्लत क्यों करना ||

होती है महोब्बत पाकीज़ा, इश्क में अक्श है मालिक का |

यह तो दौलत रूहों की, फिर इसकी तिज़ारत क्यों करना ||

हम तुम का ना होता भेद कोई, धडकन ना दूजी होती है ||

गैर नहीं फ़िर कैसे गिले, अपनी ही शिकायत क्यों करना ||

यह फ़ानी दुनियाँ मिट जानी, प्यार कभी ना मिट सकता |

ये मेहर-ए-मालिक होती है, तौहीन-ए-उल्फत क्यों करना ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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