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Broken_Love_by_stormofdestiny

कुछ तो हासिल हो जाती है, कुछ होती कहाँ पर पूरी है |

इस धरा गगन के बीच बहुत सी, मन की साध अधूरी है ||

कुछ सोचों की भेंट छड़े, कुछ लाज़ जगत से मर जाती |

कुछ मान प्रतिष्ठा की बेडी में, हैं पड़ी सदा ही अकुलाती ||

कुछ बंधन में रहती बंधकर, कुछ को मार मर्यादा देती है |

कुछ होठों के बंद किलों में रह, विकट यातना सहती है ||

कुछ भयभीत भावी से होती, कुछ भय समाज से डर जाती |

कुछ आशंकाओं से घबराकर, है घुट घुट करके मर जाती ||

कुछ का लक्ष्य असाध्य होता, कुछ बिन पुरुषार्थ रह जाती |

कुछ असमंजश भंवर भटककर, कहाँ कभी कुछ कह पाती ||

कुछ अपनों की इच्छा रखने, बलिवेदी स्वयं ही चढ़ जाती |

कुछ आ जाती किस्मत के हिस्से, कुछ कायरता खा जाती ||

कैसे हसरत हों सब पूरी,  जब आड़े आ जाती मजबूरी है |

इस धरा गगन के बीच बहुत सी, मन की साध अधूरी है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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