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peace

अपनों के चुभे गर काँटा कोई, तो दिल की धड़कन बढ़ जाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

नर तन पाकर नर्तन कितने, हैं मनुज धरा पर करते रहते |

निज हित सधे भले कुछ हो जाए, पर धन, हक हरते रहते ||

जब कोई सम्पदा संग ना जानी, तृष्णा फ़िर क्यूँ बढती जाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

देकर ईश ने कर और मेधा, जीवों में श्रेष्ठ बनाया मानव को |

और कर्म भेद के सार सकल से, परिचित करवाया मानव को ||

फ़िर कर्म विमुख क्यूँ पथ चल मानव, जाते हैं बनते अपघाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

नर से सहज पशु है बनना, लेकिन, कहाँ सहज है नर बनना |

असि धार पर पदत्रान विहीन हों, वैसा है सत पथ पर चलना ||

माना अनीति मग चाल सरलतम, पर कितने उर यह तड़पाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

मर्यादा, धैर्य, विवेक सखा हैं, और उपकार अमोलक थाती हैं |

देह है दीपक और कर्म स्नेहन, प्रज्ञा आभा तो साँसे बाती हैं ||

सब जान बने  हैं अनजान मनुज, अक्ल घास क्यूँ चरने जाती |

क्या होती पीर नहीं औरों को, यह बात समझ ना क्यूँ आती ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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