Tags

, , , , , ,

thinking_man_by_batbayar13-d585p6w

जितना सुलझाता हूँ इसको, यह तो और उलझती जाती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

क्यूँ और कहाँ से आया हूँ, आकर क्या पाया मैंने, क्या खोया,

फ़िर जाना है किस और यहाँ से, यह सोच अक्ल चकराती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

इस छोटी सी वय में हमने, कितने ज्यादा बंधन, भेद बनाए,

तोडूंगी इक झटके से मैं सब, यह कह मौत खडी मुस्काती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

ना साथ जन्म का कोई साथी, ना कोई संगी अंतिम पल का,

नहीं जड़ें जीवन की गहरी, फ़िर क्यों तृष्णा बढती जाती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

न तन पर वश, न मन काबू में, ना साँसों पर ही हक कोई,

क्यों औरों पर मूर्ख मति, अपना अधिकार जताती जाती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

ना अपना चिंतन, पाकर नर तन, खोते अमोलक थाती को,

हम कहते हैं हो रहा बड़ा, पर सच में आयु घटती जाती है |

लाख सम्हालूँ, जतन करूँ, पर हर साँस फिसलती जाती है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

Advertisements