Tags

, , , , , ,

creation-of-man-roejae

अनवरत चक्र समय का चलता, कोई गिरता कोई उठता |

जिसमें कोई ज्योति नहीं है, यह कैसा है दीपक जलता ||

तृष्णा और अधिक पाने की, समय किसी के पास नहीं ,

कैसी लालसा जीवन में, लगता पाया कुछ वो ख़ास नहीं |

अपनों के सपने बुनने में, जन कुछ ऐसे जाले बुन बैठे हैं,

जिसमें केवल पड़े भटकना, पथ नर ऐसे ही चुन बैठे हैं |

औरों पर करते दोषारोपण, मानव खुद को खुद ही छलता |

जिसमें कोई ज्योति नहीं है, यह कैसा है दीपक जलता ||

आदि अंत का पता नहीं है, क्या थे फ़िर और क्या होंगे,

कुछ साँसों का ताना बाना है, जब टूटे ना ज्ञात कहाँ होंगे |

जिनको अपना कहते हैं, वो तो पल भर में छोड़ चले जाते,

लाख पुकारें, रो लें कितना, मुड़कर ना वो क्षण को आते |

महा मोह का अनुचर नर, बन निर्मोही इस जग से चलता |

जिसमें कोई ज्योति नहीं है, यह कैसा है दीपक जलता ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

Advertisements