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मधुबन बीच में जब मनमोहन, हाथ गह्यो वृषभानु कुमारी |

लखि लाज़ राधिके लोचन में, तब पल्लव ओट किए बनवारी ||

खग कुंजन अकुलाय उठे सब, अरु ढूंढत युगल छवि चितहारी |

निश्छल नेह अमल जल बिम्बित, मराल मनोरथ पाएहु चारी ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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