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जाता हूँ बस खिंचता ही, कैसा आकर्षण खींच रहा |

मेरे उर ऊसर अन्दर, बो कौन प्रेम के बीज रहा ||

ज़हर भरे जग बोलों से, जो मेरे सपने दग्ध हुए,

आज उन्हें सहला हौले से, प्रेम सुधा से सींच रहा |

जाता हूँ बस खिंचता ही, कैसा आकर्षण खींच रहा ||

अपलक प्रतीक्षारत रहते, नींद नहीं पर स्वप्न  भरे,

आकर बोझिल नयनों को, मृदुल करों से मींच रहा |

जाता हूँ बस खिंचता ही, कैसा आकर्षण खींच रहा ||

शुष्क, वीराने अंतस में, नवल नेह के पुष्प खिला,

अपने उर के अमृत को, वह दोनों हाथ उलीच रहा |

जाता हूँ बस खिंचता ही, कैसा आकर्षण खींच रहा ||

बद्ध पिंजर इच्छाओं को, पंख सुकोमल दे डाले,

मन पंछी उड़ने को व्याकुल, मैं हूँ कि भींच रहा |

जाता हूँ बस खिंचता ही, कैसा आकर्षण खींच रहा ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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