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धैर्य, तस्सली, सहित भूलने के, यत्न अनेकों करते हैं |

पर रिसते रहते घाव उम्र भर, जो वाणी से लगते हैं ||

कैसा है दस्तूर जगत का, आज बुरे, थे जो भले कभी,

चलता उनको कर देते, जिनका कर थामें चले कभी |

साँसे तो चलती रहती है, हतभागे जीते जी मरते हैं |

पर रिसते रहते घाव उम्र भर, जो वाणी से लगते हैं ||

रिश्तों का पैमाना कितना, आज मनुज ने घटा दिया,

पिता भार और पुत्र प्राण है, मूल मंत्र ये बना लिया |

असहाय मौन के साधक, अन्दर रोते, ऊपर हँसते हैं |

पर रिसते रहते घाव उम्र भर, जो वाणी से लगते हैं ||

निज हित में नर होकर अन्धे, अनर्थ सृष्टि रचते हैं,

सोच कसौटी बिना कसे ही, शब्दों को प्रकट करते हैं |

बेखबर भविष्य अपने से, पथ बर्बादी पग धरते हैं |

वे रिसते रहते घाव उम्र भर, जो वाणी से लगते हैं ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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