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फ़िर पाने के संग में खोया, फ़िर से दिवस की सांझ हुई |

फ़िर कालिख के घन घिर आए, फ़िर रश्मि संग भोर नई ||

अनवरत चक्र में चलना है, आरोह, अवरोहों को संग लिए,

कभी धरा पे गिरे चित्त हो, कभी पुरजोश बुलंदी नई छुई |

फ़िर कालिख के घन घिर आए, फ़िर रश्मि संग भोर नई ||

अनथक श्रम यहाँ जन करते, और-और का नित मंत्र जपे,

चंचल कमला थिर हो कैसे ? है आज यहाँ, कल वहाँ गई |

फ़िर कालिख के घन घिर आए, फ़िर रश्मि संग भोर नई ||

विवेक विमुख मनुज होकर, है अन्धानुगमन करता रहता |

हर का अपना औचित्य यहाँ, वह चाहे असि हो, चाहे सुई |

फ़िर कालिख के घन घिर आए, फ़िर रश्मि संग भोर नई ||

विधि ने विश्व संरचना संग, उत्पति विलोम की कर डाली |

हैं कर्म प्रबंधन अनुरूप नतीज़े, कोई पराजित, कोई जयी |

फ़िर कालिख के घन घिर आए, फ़िर रश्मि संग भोर नई ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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