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भवन बहुत से भव्य हमें, यह दो नयन दिखाते हैं |

जैसा भी हो घर अपना, हम उसमें तसल्ली पाते हैं ||

फ़िर क्योंकर तृष्णा का मन में, बीज पनपने देते हो,

संतोष परम धन रहा सदा, क्यूँ नहीं आनंद लेते हो |

ज्यादा का लालच वाले ही, तो अक्सर धोखा खाते हैं |

जैसा भी हो घर अपना, हम उसमें तसल्ली पाते हैं ||

जीवन की आप-धापी में, हम निज़ को भुलाये बैठें हैं,

कुछ हमसे रूठे बैठे हैं, और कुछ से हम ऐंठे बैठे हैं |

छोटे से जीवन में कितनी, हम लम्बी दूरी बढ़ाते हैं |

जैसा भी हो घर अपना, हम उसमें तसल्ली पाते हैं ||

सदा नहीं रहना है जग में, निश्चित इक दिन जाना है,

यक्ष प्रश्न को हल कर लो, क्या खोना, क्या पाना है ?

प्रतिपल जीवन कोष रीतता, नादानी में खोते जाते हैं |

जैसा भी हो घर अपना, हम उसमें तसल्ली पाते हैं ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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