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आलम-ए-दीवानगी, है इस कदर बढ़ चुकी ,

खामोश लम्हे भी, अब मुझसे बात करते है |

मौसम के है ना रहे, अब तो अपने दायरे ,

फिज़ा में ही नहीं, बहारों में पात गिरते हैं |

लहू आदमी का यहाँ, रंग- ए- ज़र्द हो चुका ,

हैवानियत से कहाँ, इंसानियत से ड़रते हैं |

बदल चुका इस तरहा, अंदाज़ -ए -आशिक़ी,

दुहाई नामे इश्क़ है, और ज़िस्मों पे मरते हैं |

हया हुई हवा यहाँ, ना रही अदब आँखों में ,

अब चमन को बागबाँ, नागफनी से भरते हैं |

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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