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प्रीति की रीति सुनो मनमोहन, कटार दुधार पे धावन जैसी |

पास रहो लजियात झुके हैं, हो दूर तो अखियाँ सावन जैसी ||

सालत है दिन रैन हिये में, नवनीत सी बात लुभावन जैसी |

आरसी निहारत हूँ मुख आपनो, दीखे छवि तेरे आनन जैसी ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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