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जिह्वा कहाँ रुकती कहने में, घर में शेर सदा बन रहते हो |

जो शोषित हैं, दो शब्द कभी, क्या उन पर भी तुम बोलोगे ??

मफ़लर, शाल, रजाई ओढ़े, और गर्म व्यंजनों का लुत्फ़ उठाते |

शीत भीत जो पड़े फुटपाथों पर ,क्या उनकी पीड़ा भी तोलोगे ??

होता बहुत लालायित मन, हुस्न देखकर, चर्चे, किस्से सुनकर |

जो है झुर्रियों वाला चेहरा, हाथ लिए, उसके लिए कब ड़ोलोगे ??

शान-औ-शौकत, एश-औ-आराम पर, पैसा पानी सा बहाते रहते |

हैं असहाय, लाचार, दीन मनुज, उन हित भी हाथों को खोलोगे ??

छिनता बचपन, मिटते सपने, और जो कचरा टटोलते कर नन्हें |

खोये हो अपनी रंगीनी में, क्या उनके जीवन में भी रंग घोलोगे ??

दुर्लभ देह विधि ने दी है, क्योंकर फ़िर उसको अकारथ खोते हो |

जीवन सार्थक उस दिन होगा, जिस दिन पीड़ित के संग रो लोगे ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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