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आज चलो छू ले उनको, जिनसे तो हम बचते आए |

बिना भेद उन संग बैठें, जिनसे किनारा करते आए ||

एक मिट्टी की रचना सब, उर में भाव उदय हो ये |

जिसको पढ़ना शेष रहा है, केवल एक विषय हो ये ||

विस्मृत कर दें वे सब बातें, जो अब तक पढ़ते आए |

बिना भेद उन संग बैठें, जिनसे किनारा करते आए ||

अदृश्य पाश से बंधे हुए थे, आज़ादी का भ्रम लिए |

बहकावे में आकर हमने, कितने घृणित कर्म किए ||

आज छलें उन छलियों को, जो हमको छलते आए |

बिना भेद उन संग बैठें, जिनसे किनारा करते आए ||

धर्म, वर्ण, सब मिथ्या बातें, रक्त कहानी सच्ची है |

पहचान मनुज की करने में, अक्ल अभी क्यों कच्ची है ||

निर्भय ललकारें पाखंडियों को, जिनसे हम डरते आए |

बिना भेद उन संग बैठें, जिनसे किनारा करते आए ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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