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kanha

दधि मथने में लीन यसुमति, निरखत मनमोहन केलि नहीं |

तब श्याम विचारि कियो चित में, आँगन मांहि गिरायो मही ||

जब रिस आनन मात लख्यो, तो घाम की बात बनाय कही |

उपज्यो अनुराग हिये जननी, तब लाल को अंक लुकाय रही ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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