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तरु पल्लव स्तब्ध हुए सब, साँस पवन की थमती है |

नुपूर की स्वर लहरी घोले, ये कौन धरा पर चलती है ?

चन्द्र छवि की प्रीत में पड़कर, अंगार भी मैंने पचाए हैं,

इस आनन के ओप के आगे, प्रीतम भी मेरे लजाए हैं |

है चकित,भ्रमित चकोर मति, ये शशि से सुंदर लगती है ?

नुपूर की स्वर लहरी घोले, ये कौन धरा पर चलती है ??

सौरभ तन की यूँ फैली, अलका संग गुंजित अलि लिपटता,

अपनी महक की मिथ्या का, मधुबन को भान हुआ लगता |

लज्जित सुमन हैं रहे सोच, ये हँसती,या हम पर हँसती है ?

नुपूर की स्वर लहरी घोले, ये कौन धरा पर चलती है ??

सिंह,शुक,खंजन,मीन,अलि,गज, उपमान सभी फीके सारे,

सुघड़ गात पर चीर मनोहर, भूषण सकल अंग पर धारे |

स्पर्श को सब हैं लालायित, कंचन सी काया दिखती है |

नुपूर की स्वर लहरी घोले, ये कौन धरा पर चलती है ??

ऐसा लावण्य, ऐसी सुघड़ता, कर विधि के तो कंपे होंगे,

इस रूप माधुर्य को गढ़ने में, कितने ही कल्प लगे होंगे |

कोई क्या उसपे लिखे भला, जो खुद छंदों को रचती है ?

नुपूर की स्वर लहरी घोले, ये कौन धरा पर चलती है ??

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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