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श्याम की चाह

इक अति शोभित सिर पर गागर, इक ललना की लंक छुए |

झीने पट पीठ पे बेनी लसै, मनो नागिन हो बल खाए हुए ||

देह में लचक, ठमक पाँवन में, तो हौले से बाज गए बिछुए ||

भरि नयनन नेह मुड़ी वनिता, उसे देखत कान्ह अधीर भए ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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