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मुग्धा

हासिल कुछ ना होना था, नाशादी के आलम में,

हमने मायूसी के साये, चेहरे से अपने पोंछ दिये |

कूव्वत कहाँ आईनों में, फ़ितरत को दिखलाने की,

क्योंकर निस्बत रखनी थी, फ़ाकिरों को सौंप दिये |

अश्कों का सैलाब बहाता, अरमानों की दुनिया को,

बर्बादी के बायस इन ,धारों के रुख को मोड़ दिये |

नाज़िश-ए-निज़ाम सदा, दानिस्ता नक्बत होता है,

आज वतन के ज़ाबिता, नाकाबिलों पर छोड़ दिये |

जिस्म औ’ ज़हमत की, नाफ़हम नुमाइश करते हैं,

आसिम से इख्लास नहीं, अब सारे नाते तोड़ दिये |

1.निस्बत=संबंध,मोह 2. फ़ाकिर=अभिमानी

3.नाज़िश =घमंड,   4.दानिस्ता=जानते हुए

5.नक्बत=दुर्भाग्य,विपदा 6.ज़ाबिता=नियम,रीति

7.नाफ़हम=मूर्ख  8.आसिम=पापी,दोषी

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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