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कपोल धरे कर मेहंदी सुसज्जित, नयनों में नेह समाए हुए |

भूषण,वसन अति अंग सुशोभित, रति को आज लजाए हुए ||

कुंतल संग छवि बोर मिली, मनो बदरी पे चंद हो छाए हुए |

खंजन नयन में कज्जल रेखा, मदमाते अधर मुस्काए हुए ||

उर राजे मुक्तन माल मनो, गिरि पंगत मराल बिठाए हुए |

गात मनोहर रात में दमकत, प्रीति की ज्योति जगाए हुए ||

श्रृंगार सभी अंग रुचिकर साजै, छवि इन्द्रधनुषी बनाए हुए |

कह ना सकें कुछ और प्रिये, तुम चितवन चैन चुराए हुए ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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