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tamnna

गिरी से गिरते निर्झर की, गूँज सुहानी लगती है |

तरु पत्तों से छन आने वाली, धूप सुहानी लगती है ||

दुनियाँ में बहुतेरे भोजन, महंगे और लज़ीज़ बने |

सूखी रोटी माँ के हाथों की, भूख सुहानी लगती है ||

साज़ औ”सुर,लय,ताल सभी, राहत दिल को देते हैं |

कोकिल की अमराई मध्य, कूक सुहानी लगती है ||

बातों के बाज़ीगर अपने, लहज़ों में माहरत रखते हैं |

लफ्फाज़ी के लटकों से, दो-टूक सुहानी लगती है ||

इकरसता में प्यार कभी ना, अपना आनन्द दे पाता |

की तुमसे दो सुनने को, वो चूक सुहानी लगती है ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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