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बह लो जी भर मौका है, तोड़ चलो तटबंधों को,

चाहे भार गिरि का आये, मत झुकने दो कंधों को ||

दबने वालों को ये दुनिया, पूरे जोर दबाती है,

जो जूते की नोक पे रखते, उनके हुक्म उठाती है |

चांटा एक लगे गाल पर, बदले चार लगाने हैं,

थोथे आदर्शों पर चलना, केवल धोखे खाने हैं |

हमको तो बस रचना है, ऐसे जग सम्बन्धों को |

बह लो जी भर मौका है, तोड़ चलो तटबंधों को ||

दुनिया एक सियासतखाना, सब बाज़ीगर पासों के,

बुनियादें हो कितनी गहरी, महल सभी हैं ताशों के |

हम-तुम, सारे रिश्ते-नाते, दौलत,दुनिया फ़ानी है,

सभी सलामत साँसों के संग, पीछे खत्म कहानी है |

खाये,पिये,मौज करें हम, रोने दो आँख के अंधों को |

बह लो जी भर मौका है, तोड़ चलो तटबंधों को ||

सहते सितम क्यूँ मौन साध? उठो पलट प्रहार करें,

जब मरना इक रोज़ मुकर्रर, फिर क्यूँ सौ-सौ बार मरें ?

ना कोई लिहाज़,ना शर्म कोई, कहना है बेबाकी से,

सतर्क हमें रहना है उनसे, जो ठगे हमें चालाकी से |

जीवन को इक जश्न बनायें, छोड़ें गोरख धंधों को |

बह लो जी भर मौका है, तोड़ चलो तटबंधों को ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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