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आ जग री गज्ज़ब गति, हेतु करे अकाज

करता नह शंका हुवे, कहता आवे लाज ||1 ||

(इस संसार की गति भी गज़ब है कि,अपने ही अनर्थ करते हैं|उन्हें करते हुए नहीं कहते हुए लज्जा आती है |)

ये परकत रा आखरा, खालिस और खरा |

पानी सागे ही घटे, मिनखां और धरा ||2 ||

(प्रकृति के ये अक्षर साफ़ और स्पष्ट हैं,जैसे-जैसे धरती पर पानी की मात्रा घट रही है,वैसे-वैसे ही मनुष्यता भी घट रही है |

ताती बालू रेत में, कदे ना बीज़ उगे |

प्रीत बूँद पावस पड़े, हरियल बाग लगे ||3 ||

(जैसे गरम रेत में बीज़ नहीं उगता है,लेकिन पानी के साथ संयोग होने पर हरियाली छा जाती है,ठीक उसी तरह शुष्क ह्रदय में प्रीत के आने से ही प्रसन्नता होती है |)

मोटा आखर भाग रा, नैना ना दीखेह |
चातर चित सूं बांच ले, मूर्ख विप्र पूछेह ||4 ||

(भाग्य के अक्षर तो मोटे होते हैं लेकिन आँखों से दिखाई नहीं देते हैं,चतुर मनुष्य तो अपनी बुद्धि से इन्हें पढ़ लेते हैं,लेकिन मूर्ख ज्योतिषियों का सहारा लेते हैं |

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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