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मायूसी के साये हमने, गुलशन में तब्दील किये हैं,

बेफिक्र ज़माने वालों से, शाद-ए-आलम बीच जिये हैं |

तूफां से डरने वाले तो, कब कहो कंहाँ उस पार गये ,

अपनी तो किश्ती ने यारो, तूफानों में छेद किये हैं |

खामोश लबों से तुमने सुना,अपनी तो आदत बेबाकी,

हमने जीवन जाम उठाया,गम के तुमने घूँट पिये हैं |

ज़ख्म लगाने वाले तो, कब उनकी मरहम करते हैं,

इमदाद-ए-हसरत ना रखी, हमने अपने आप सिये हैं |

क्यों सर पर लेकर क़र्ज़ जियें,अपनी तो है सोच यही,

एक अगर दुनिया से मिला,हमने सिले में चार दिये हैं |

सहरा हो या सागर हो, हैं तो नियामत कुदरत की,

अपने हिस्से जो भी आया, हमने पूरे लुत्फ़ लिये हैं |

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

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