Tags

, , , ,

                                              

622

बहुत रहे बंद किलों में, अब तो इनको ढ़हने दो |

अपने मन की तुम जानो, मुझको अपनी कहने दो ||

धुआं-धुआं मरने से बेहतर, धधक मुझे जल जाना है,

जी भर जी ले इस पल में, किसने तो कल जाना है ?

अपनों की पीड़ा बहुत सही, औरों की अब सहने दो |

अपने मन की तुम जानो, मुझको अपनी कहने दो ||         

आडम्बर की चादर से अब, मैं छुटकारा चाहता हूँ,           

जो थे पड़े चहरे के ऊपर,वो परदे आज हटाता हूँ,

ढक-ढूम रहा इतने दिन,अब तो खुला रहने दो |

अपने मन की तुम जानो, मुझको अपनी कहने दो ||

लिहाज़, शर्म के ताले अब तक, लगे रहे उद्गारों पर

कुछ सोच बिठा रखे थे पहरे, मैंने उग्र विचारों पर ,

अरसा बीता अधर सिले, अब तो इनको खुलने दो |

अपने मन की तुम जानो, मुझको अपनी कहने दो ||

बहुत सहा चुपचाप रहा, अब तो सहन नहीं होगा,

इन अश्कों में भार बहुत है, मुझसे वहन नहीं होगा,

आहत की आँखों के संग मिल,अब तो इनको बहने दो |

अपने मन की तुम जानो, मुझको अपनी कहने दो ||

नैतिकता,मर्यादा, मानवता, बीते युग की बातें लगती,

जो राही इन राहों के, ये दुनिया अब उन पर हँसती,

मत डालो बेडी पावों में ,मुझको तो इन पर चलने दो |

अपने मन की तुम जानो, मुझको अपनी कहने दो ||

उम्मेद देवल

उम्मेद देवल

Advertisements